विज्ञापन सुंदरी — नागार्जुन

November 26th, 2009

विज्ञापन सुंदरी

रमा लो मांग में सिन्दूरी छलना…

फिर बेटी विज्ञापन लेने निकलना…

तुम्हारी चाची को यह गुर कहाँ था मालूम!

हाथ न हुए पीले

विधि विहित पत्नी किसी की हो न सकीं

चौरंगी के पीछे वो जो होटल है

और उस होटल का

वो जो मुच्छड़ रौबीला बैरा है

ले गया सपने में बार-बार यादवपुर

कैरियर पे लाद के कि आख़िर शादी तो होगी ही

नहीं? मैं झूठ कहता हूँ?

ओ, हे युग नन्दिनी विज्ञापन सुन्दरी,

गलाती है तुम्हारी मुस्कान की मृदु मद्धिम आँच

धन-कुलिश हिय-हम कुबेर के छौनों को

क्या ख़ूब!

क्या ख़ूब

कर लाई सिक्योर विज्ञापन के आर्डर!

क्या कहा?

डेढ़ हज़ार?

अजी, वाह, सत्रह सौ!

सत्रह सौ के विज्ञापन?

आओ, बेटी, आ जाओ, पास बैठो

तफसील में बताओ…

कहाँ-कहाँ जाना पड़ा? कै-कै बार?

क्लाइव रोड?

डलहौजी?

चौरंगी?

ब्रेबोर्न रोड?

बर्बाद हुए तीन रोज़ : पाँच शामें ?

कोई बात नहीं…

कोई बात नहीं…

आओ, आओ, तफ़सील में बतलाओ!

अग्निबीज – नागार्जुन

November 26th, 2009

अग्निबीज
तुमने बोए थे
रमे जूझते,
युग के बहु आयामी
सपनों में, प्रिय
खोए थे!
अग्निबीज
तुमने बोए थे

तब के वे साथी
क्या से क्या हो गए,
कर दिया क्या से क्या तो,
देख-देख
प्रतिरूपी छवियाँ
पहले खीझे
फिर रोए थे
अग्निबीज
तुमने बोए थे

ऋषि की दृष्टि
मिली थी सचमुच
भारतीय आत्मा थे तुम तो
लाभ-लोभ की हीन भावना
पास न फटकी
अपनों की यह ओछी नीयत
प्रतिपल ही
काँटों-सी खटकी
स्वेच्छावश तुम
शरशैया पर लेट गए थे
लेकिन उन पतले होठों पर
मुस्कानों की आभा भी तो
कभी-कभी खेला करती थी!
यही फूल की अभिलाषा थी
निश्चय, तुम तो
इस ‘जन-युग’ के
बोधिसत्व थे,
पारमिता में त्याग तत्व थे।

बाकी बच गया अण्डा (Nagarjun)

November 26th, 2009

बाकी बच गया अण्डा

पाँच पूत भारतमाता के, दुश्मन था खूंखार
गोली खाकर एक मर गया,बाकी रह गये चार

चार पूत भारतमाता के, चारों चतुर-प्रवीन
देश-निकाला मिला एक को, बाकी रह गये तीन

तीन पूत भारतमाता के, लड़ने लग गये वो
अलग हो गया उधर एक, अब बाकी बच गये दो

दो बेटे भारतमाता के, छोड़ पुरानी टेक
चिपक गया है एक गद्दी से, बाकी बच गया एक

एक पूत भारतमाता का, कन्धे पर है झन्डा
पुलिस पकड कर जेल ले गई, बाकी बच गया अंडा

बादल को घिरते देखा है / नागार्जुन

November 26th, 2009

बादल को घिरते देखा है / नागार्जुन

अमल धवल गिरि के शिखरों पर,
बादल को घिरते देखा है
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहिन कणों को,
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

उस महान् सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर
प्रणय-कलह छिड़ते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

शत-सहस्र फुट ऊँचाई पर
दुर्गम बर्फानी घाटी में
अलख नाभि से उठने वाले
निज के ही उन्मादक परिमल-
के पीछे धावित हो-होकर
तरल-तरुण कस्तूरी मृग को
अपने पर चिढ़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

कहाँ गया धनपति कुबेर वह
कहाँ गई उसकी वह अलका
नहीं ठिकाना कालिदास के
व्योम-प्रवाही गंगाजल का,
ढूँढ़ा बहुत किन्तु लगा क्या
मेघदूत का पता कहीं पर,
कौन बताए वह छायामय
बरस पड़ा होगा न यहीं पर,
जाने दो वह कवि-कल्पित था,
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभ-चुंबी कैलाश शीर्ष पर,
महामेघ को झंझानिल से
गरज-गरज भिड़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।

शत-शत निर्झर-निर्झरणी कल
मुखरित देवदारु कानन में,
शोणित धवल भोज पत्रों से
छाई हुई कुटी के भीतर,
रंग-बिरंगे और सुगन्धित
फूलों की कुंतल को साजे,
इंद्रनील की माला डाले
शंख-सरीखे सुघड़ गलों में,
कानों में कुवलय लटकाए,
शतदल लाल कमल वेणी में,
रजत-रचित मणि
खचित कलामय
पान पात्र द्राक्षासव पूरित
रखे सामने अपने-अपने
लोहित चंदन की त्रिपटी पर,
नरम निदाग बाल कस्तूरी
मृगछालों पर पलथी मारे
मदिरारुण आखों वाले उन
उन्मद किन्नर-किन्नरियों की
मृदुल मनोरम अँगुलियों को
वंशी पर फिरते देखा है।
बादल को घिरते देखा है।

बाबा नागार्जुन की कविताएँ – सन्‌ १९६२ ई.

November 26th, 2009

बाबा नागार्जुन की कविताएँ – सन्‌ १९६२ ई.

१९६२ युद्ध पर बाबा नागार्जुन ने कुछ कविताएँ लिखी थीं जो उस समय की पत्र-पत्रिकाओं में छपी थी। धर्मयुग के २३ दिसम्बर १९६२ अंक में छपी कुछ कविताएँ प्रस्तुत हैं :-

तप्त लहू की धार बह चली
वो निकले ज़हरीले कीडे़, लाल कमल से

तप्त लहू की धार बह चली तुहिनाचल से

हमने देखा रंग बर्फ़ का बदल रहा है

शांति सुंदरी का तो दम ही निकल रहा है

जी करता है, सीखूं मैं बंदूक चलाना

जी करता है, सीखूं मैं फ़ौलाद गलाना

जी करता है, जन-मन में भड़काऊँ शोले

जी करता है, नेफ़ा पहुंचूं, दागूं गोले

विश्व शाँति की घायल देवी चीख रही है

सर्वनाश की डायन हँसती दीख रही है

दुनिया की छत पर टपका है लाल दनुज की

पंचशील से बिदक गई चेतना मनुज की

सीमाओं पर लहराया भारत का यौवन

छलक गया लहू, शर्म से पिघला कंचन

दीपशिखा-सी कोटि-कोटि मन की इच्छाएँ

मचल उठी है, सेनापति का इंगित पाएँ

वो निकले ज़हरीले कीडे़ लाल कमल से

तप्त लहू की धार बह चली तुहिनाचल से

कट्टर कामरेड
आओ जी, आओ जी, आओ जी

माओ-सी, शाओ-ची, चाओ जी

आओ जी, आओ जी, आओ जी

हटा नहीं आँखों का पट्टर

कामरेड हूँ कैसा कट्टर

मुझे लील लो

मुँह तो पुरा बाओ जी

आओ जी, आओ जी, आओ जी!
जपता हूँ स्टेलिन का नाम

नेफ़ा क्या आएगा काम

पेकिंग-मास्को-बर्लिन-प्राग

घूम चुका हूँ चारो धाम

नेहरू को गालियाँ सुनाईं

तुमको किया सदैव प्रणाम

वर्ग चेतना के गुरुदेव

तुम से डरता है ख़्रुश्चेव

मुझ बुद्धू को आँखें मत दिखलाओ जी

आओ जी, आओ जी, आओ जी

नये तर्ज़ पर इंटरनेशनल गाओ जी

आओ जी, आओ जी, आओ जी

साभारः साहित्यपरिक्रमा-अप्रेल-जून २००९

Nargarjun’s Dohe

November 24th, 2009

नागार्जुन के दोहे – अन्नपचीसी से

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सीधे सादे शब्द हैं, भाव बड़े ही गूढ़।
अन्नपचीसी खोल ले, अर्थ जान ले मूढ़।

कबिरा खड़ा बज़ार में लिए लुकाठी हाथ।
बंदा क्या घबराएगा जनता देगी साथ।

छीन सके तो छीन ले, लूट सके तो लूट।
मिल सकती कैसे भला अन्न चोर को छूट।

आज गहन है भूख का, धुंधला है आकाश।
कल अपनी सरकार का होगा पर्दाफाश।

नागार्जुन मुख से कढ़े साखी के ये बोल।
साथी को समझाइए रचना है अनमोल।

अन्न पचीसी मुख्तसर, लोग करोड़ करोड़।
सचमुच ही लग जाएगी, आँख कान में होड़।

अन्न ब्रह्म ही ब्रह्म है बाकी ब्रह्म पिशाच।
औघड़ मैथिल नाग जी अर्जुन यही उवाच।